अरविंद दुगारिया, आगर मालवा- जिला मुख्यालय से एक ऐसा दृश्य सामने आया है, जिसे देखकर सिस्टम की पोल खुलती नजर आती है। यहां किसानों ने अब खुद की जगह आधार कार्ड, जमीन के दस्तावेज़ और नाम लिखे पत्थर लाइन में लगा दिए हैं। हफ्तों से खाद की कमी और सीमित कूपन के चलते किसानों का विश्वास अब खुद पर नहीं, बल्कि अपने दस्तावेज़ों पर टिका है।
सुबह के 6 बजे से कतार लगना आम बात हो गई है। सूरज की पहली किरण के साथ ही सड़क पर दस्तावेज़ों और पत्थरों की पंक्तियां सजी होती हैं। हर दिन केवल 40 किसानों को ही कूपन मिलते हैं, जिनके आधार पर बाद में खाद वितरण होता है। जैसे ही कूपन बांटने वाला कर्मचारी आता है, भीड़ उमड़ पड़ती है, और अफरा-तफरी, धक्का-मुक्की और नाराज़गी शुरू हो जाती है।
इस संघर्ष में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। सुबह-सुबह घर के काम छोड़कर वे भी लाइन में जुट जाती हैं। कतार में बिखरे आधार कार्ड, जमीन की कॉपियां और नाम लिखे पत्थर जैसे सिर्फ दस्तावेज़ नहीं, बल्कि किसानों की जीती-जागती उम्मीदें हैं।
यह नज़ारा सिर्फ एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सच्चाई बयां करता है—जहां किसान को अपनी पहचान भी सड़क और खेतों पर रखनी पड़ रही है। सवाल यही है: क्या कभी ये लाइन खत्म होगी, या किसान यूं ही पत्थरों पर अपना नाम लिखकर उम्मीद की फसल बोते रहेंगे?

