अरविंद दुगारिया, आगर मालवा- नलखेड़ा में मां बगलामुखी मंदिर के समीप बरसाती नाले में कार बहने से 8 लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। हादसे को तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब इस दर्दनाक घटना से भी बड़ा सवाल सामने खड़ा है कि आखिर इन आठ मौतों की जिम्मेदारी किसकी है? खासकर तब, जब हादसे से पहले घटनास्थल की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसले सवालों के घेरे में हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि 18 अगस्त को हुई बैठक के बाद जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रसारित समाचार में कलेक्टर डॉ. शेर सिंह मीणा के निर्देशों का उल्लेख किया गया था। इस समाचार के अनुसार घटनास्थल पर लगाए गए बैरिकेड्स को हटाने और संबंधित व्यवस्था को लेकर निर्देश दिए गए थे। जब यह तथ्य प्रशासन के ही जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रसारित किया गया था, तो अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि सुरक्षा के लिए लगाए गए बैरिकेड्स हटाए गए थे, तो उसके बाद वहां श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या प्रशासन को यह अंदाजा नहीं था कि बारिश के मौसम में नाले का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है? क्या ऐसे स्थान पर बैरिकेडिंग और पर्याप्त रोशनी जैसी व्यवस्थाएं जरूरी नहीं थीं? यदि जरूरी थीं तो उन्हें बनाए रखने की जिम्मेदारी किस अधिकारी या विभाग की थी? और यदि बैरिकेड हटाने का निर्णय प्रशासनिक स्तर पर लिया गया था, तो क्या उस निर्णय की परिस्थितियों और उसके बाद की सुरक्षा व्यवस्था की जांच नहीं होनी चाहिए? 19 सितंबर को वही हुआ, जिसका डर होना चाहिए था। तेज बारिश के बीच नाले में पानी का बहाव बढ़ा और श्रद्धालुओं से भरी कार उसकी चपेट में आ गई। देखते ही देखते आठ जिंदगियां काल के गाल में समा गईं। तीन मासूम बच्चों सहित आठ लोगों की मौत के बाद पूरा इलाका गम में डूब गया। परिवारों की खुशियां मातम में बदल गईं और ओडिशा से दर्शन के लिए आए श्रद्धालु अपने घर वापस नहीं लौट सके लेकिन अब सवाल यह है कि क्या इस पूरी घटना को सिर्फ ‘अचानक आई बाढ़’ या ‘दुर्भाग्यपूर्ण हादसा’ कहकर जिम्मेदारी खत्म कर दी जाएगी? क्या जांच सिर्फ यह पता लगाएगी कि कार पानी में कैसे बही, या यह भी जांच होगी कि हादसे से पहले वहां सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं थी? क्या यह जांच होगी कि बैरिकेड क्यों हटाए गए, किस निर्णय के तहत हटाए गए और उसके बाद वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं सुनिश्चित की गई? और यदि जांच में यह सामने आता है कि खतरे की जानकारी होने के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक हुई, तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या ऐसी लापरवाही को सिर्फ प्रशासनिक गलती मानकर छोड़ दिया जाएगा? या फिर यह भी जांच का विषय बनेगा कि क्या किसी की लापरवाही ने उन आठ मौतों की परिस्थितियां पैदा कीं? यहीं से सबसे कड़वा सवाल सामने आता है कि अगर सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी तो वह हटाई क्यों गई? अगर हटाई गई तो उसकी जगह दूसरी सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं की गई? अगर खतरा मौजूद था तो लोगों को वहां जाने से रोकने के इंतजाम क्यों नहीं किए गए? और अगर इन सवालों के जवाब किसी अधिकारी की गंभीर चूक की ओर इशारा करते हैं, तो क्या आठ मौतों को केवल हादसा कहना पर्याप्त होगा? हादसे के तीन दिन बाद भी घटनास्थल पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठना अपने आप में गंभीर विषय है। क्या आठ मौतों के बाद भी प्रशासन को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए था कि उसी स्थान पर दोबारा कोई श्रद्धालु खतरे में न पड़े? क्या घटनास्थल पर पर्याप्त रोशनी और बैरिकेडिंग तत्काल नहीं की जानी चाहिए थी? आठ लोगों की मौत के बाद अब सबसे जरूरी काम संवेदना व्यक्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करना है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष साबित होने पर जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ आठ मौतों का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो हादसे से पहले लोगों को सुरक्षित रखने के लिए जिम्मेदार थी। सवाल उस फैसले का है जिसके बाद सुरक्षा व्यवस्था बदली। सवाल उस निगरानी का है जो यह सुनिश्चित करने में नाकाम रही कि बारिश के बीच श्रद्धालुओं की जान खतरे में न पड़े।
क्या नलखेड़ा की आठ मौतें सिर्फ एक प्राकृतिक हादसा थीं? या इस त्रासदी के पीछे प्रशासनिक निर्णय और गंभीर लापरवाही की कोई कड़ी भी थी? क्या उस कड़ी की जांच होगी? क्या जिम्मेदारी तय होगी? और अगर लापरवाही साबित होती है तो क्या दोषियों पर ऐसी कार्रवाई होगी जिससे भविष्य में किसी और परिवार को इसी तरह उजड़ने से बचाया जा सके?
बैरिकेड हटाने का निर्देश कलेक्टर शेरसिंह मीणा का.. नतीजा 8 मौतें! क्या यह सिर्फ हादसा था या प्रशासनिक लापरवाही से हुई ‘हत्या’? आखिर 8 मौतो की जिम्मेदारी किसकी, क्या मिलेगा मृतको को इनको इंसाफ?











