“SDOP की कार्रवाई से उजागर हुई सिस्टम की कमजोरी! कोतवाली थाना प्रभारी की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल..”

अरविंद दुगारिया, आगर मालवा- जिले की पुलिस व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है, जहां एक ओर अनुविभागीय अधिकारी पुलिस (SDOP) द्वारा अवैध गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है, वहीं दूसरी ओर कोतवाली थाना स्तर पर कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में SDOP मोतीलाल कुशवाहा द्वारा स्वयं मौके पर पहुंचकर एक युवक को सट्टा लिखते हुए रंगे हाथों पकड़ना इस बात का संकेत है कि स्थानीय स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
गत रविवार को बड़ा तालाब स्थित हनुमान मंदिर के पास की गई इस कार्रवाई ने शहर में संचालित अवैध गतिविधियों और पुलिस की सक्रियता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। सामान्यतः इस तरह की कार्रवाई थाना पुलिस द्वारा की जानी चाहिए, लेकिन जब वरिष्ठ अधिकारी को खुद मैदान में उतरना पड़े, तो यह स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर संदेह उत्पन्न करता है। SDOP द्वारा पकड़े गए आरोपी के खिलाफ बाद में कोतवाली पुलिस ने प्रकरण तो दर्ज किया, लेकिन पूरे घटनाक्रम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर ऐसी गतिविधियां पहले क्यों नहीं रोकी जा सकीं।
इस बीच वर्ष 2025 का एक पुराना मामला भी फिर चर्चा में आ गया है, जिसने कोतवाली पुलिस की कार्यप्रणाली पर पहले ही सवाल खड़े किए थे। जानकारी के अनुसार 5 जून 2025 को SDOP द्वारा एक बोलेरो पिकअप वाहन को बैजनाथ मार्ग स्थित एक ढाबे के पास अवैध शराब के साथ पकड़ा गया था। वाहन और आरोपियों को कोतवाली पुलिस को सौंपा गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उस समय गंभीर कार्रवाई करने के बजाय केवल काली फिल्म का चालान काटकर मामला समाप्त कर दिया गया।
जब इस मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची, तो तत्काल नाराजगी जताई गई और अगले ही दिन 6 जून 2025 को उसी वाहन से दो बक्सों में भरे 98 क्वार्टर देसी शराब जब्त कर प्रकरण दर्ज किया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर पहली बार में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए गए, जिसकी जिम्मेदारी डीएसपी रघुनाथ खतरकर को सौंपी गई। जांच में सीसीटीवी फुटेज सहित कई साक्ष्यों को शामिल किया गया। सूत्रों के अनुसार जांच में तत्कालीन थाना प्रभारी की गंभीर लापरवाही सामने आई, जिसके बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया।
हालांकि 6 अप्रैल 2026 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय द्वारा जारी आदेश में थाना प्रभारी शशि उपाध्याय के जवाब को संतोषजनक नहीं मानते हुए केवल भविष्य के लिए चेतावनी देकर मामला समाप्त कर दिया गया। इस निर्णय ने पूरे मामले को और अधिक विवादित बना दिया है, क्योंकि इतने गंभीर मामले में केवल चेतावनी देना कई तरह के सवालों को जन्म देता है।
लगातार सामने आ रही घटनाओं से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अवैध गतिविधियों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई दे रही है। शहर में सट्टा और अवैध कारोबार की मौजूदगी के बावजूद कार्रवाई का जिम्मा जब वरिष्ठ अधिकारियों को उठाना पड़े, तो यह व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यह केवल लापरवाही का मामला नहीं हो सकता, बल्कि इसमें मिलीभगत की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
SDOP की सख्ती और कोतवाली पुलिस की कार्यप्रणाली के बीच सामने आया यह अंतर अब पुलिस विभाग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना यह होगा कि उच्च अधिकारी इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या वास्तव में जिम्मेदारों के खिलाफ ठोस कदम उठाए जाते हैं या फिर मामला केवल चेतावनी तक ही सीमित रह जाता है।

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